गौशालाओं की आत्मनिर्भरता का नया मंत्र- गोबर से ऊर्जा, गोमूत्र से मूल्यवर्धन और नवाचार से आय

संवाददाता।
-उद्यमियों, नवाचारी किसानों, गोसेवी संस्थाओं एवं गौशाला संचालकों के साथ संवाद में सामने आए आत्मनिर्भर गौशालाओं के नए मॉडल
लखनऊ। गौशालाओं को संरक्षण केंद्रों से आगे बढ़ाकर आत्मनिर्भरता, रोजगार और ग्रामीण उद्यमिता के केंद्रों के रूप में विकसित करने की दिशा में आज उत्तर प्रदेश गो सेवा आयोग के सभागार, इन्दिरा भवन, लखनऊ में उद्यमियों, नवाचारी किसानों, गोसेवी संस्थाओं, गोसेवियों एवं गौशाला संचालकों के साथ एक महत्वपूर्ण संवाद आयोजित किया गया।
संवाद में उत्तर प्रदेश गो सेवा आयोग के मा० अध्यक्ष श्री श्याम बिहारी गुप्त, मा० सदस्य श्री राजेश सिंह सेंगर, श्री दीपक गोयल एवं श्री रमाकांत उपाध्याय सहित विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े विशेषज्ञ, उद्यमी एवं नवाचारी प्रतिनिधि उपस्थित रहे।
संवाद का मुख्य बिन्दु इस बात पर रहा कि गौशालाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए गोवंश से जुड़े प्रत्येक संसाधन का वैज्ञानिक एवं व्यावसायिक मूल्यवर्धन कैसे किया जाए। इसमें दूध, गोबर और गोमूत्र को अलग-अलग उत्पाद के रूप में नहीं, बल्कि एक समग्र गो आधारित गरमाई अर्थव्यवस्था के हिस्से के रूप में विकसित करने पर विचार किया गया।
Global Confederation of Cow-Based Industries (GCCI) के सचिव श्री पुरीष कुमार ने गौशालाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता का विस्तृत राजस्व मॉडल प्रस्तुत करते हुए बताया कि यदि लगभग 200 गायों वाली गौशाला में दूध, गोबर और गोमूत्र के वैज्ञानिक मूल्यवर्धन के साथ बायोगैस, जैविक खाद, प्राकृतिक कृषि इनपुट एवं अन्य गो-आधारित उत्पादों से जुड़ी नवाचारी गतिविधियां संचालित की जाएं, तो एक सुव्यवस्थित मॉडल के माध्यम से ₹2 करोड़ तक की संभावित वार्षिक आय सृजित की जा सकती है। उन्होंने कहा कि गौशालाओं को केवल अनुदान आधारित व्यवस्था के बजाय उत्पादन, मूल्यवर्धन, ब्रांडिंग और बाजार से जोड़कर राजस्व उत्पन्न करने वाले उद्यम के रूप में विकसित करने की आवश्यकता है।
संवाद में बनासकांठा, गुजरात की गोमूत्र डेयरी के श्री देवाराम पुरोहित ने अपना प्रेरणादायी अनुभव साझा किया। उन्होंने बताया कि गुजरात के अबाला गांव में गोमूत्र के संग्रहण और वैज्ञानिक प्रसंस्करण को ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जोड़कर प्राकृतिक कृषि के लिए उपयोगी उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। इस पहल के माध्यम से स्थानीय ग्रामीण परिवारों को आय का अवसर मिलने के साथ प्राकृतिक एवं रसायन-मुक्त कृषि को भी बढ़ावा मिल रहा है।
श्री शैलेन्द्र प्रताप सिंह, पूर्व पुलिस उपाधीक्षक एवं श्री ग्राम धाम गौशाला, सिद्धपुरा, लखनऊ के संचालक ने गौशाला में विकसित बैल-आधारित विद्युत उत्पादन मॉडल की जानकारी साझा की। पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक तकनीक के समन्वय से विकसित इस पहल को उन्होंने स्वच्छ एवं नवीकरणीय ऊर्जा की दिशा में एक नवाचारी प्रयोग बताया। उन्होंने गौशालाओं को ऊर्जा उत्पादन, प्रशिक्षण एवं कौशल विकास के केंद्रों के रूप में विकसित करने की संभावनाओं पर भी प्रकाश डाला।
रूरल हब इनोवेशंस लिमिटेड के श्री गौरव गुप्ता ने ग्रामीण क्षेत्रों में नवाचार, उद्यमिता एवं स्थानीय संसाधनों के मूल्यवर्धन से जुड़े अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने गौशालाओं और ग्रामीण युवाओं को तकनीक, बाजार एवं उद्यमिता से जोड़कर स्थानीय स्तर पर रोजगार एवं आय के नए अवसर विकसित करने की संभावनाओं पर विचार रखा।
Pay Amrit Organic FPO के निदेशक श्री प्रवीण मिश्रा ने भी बैठक में गौ-आधारित सर्कुलर बायोइकोनॉमी, प्राकृतिक खेती, बायोगैस, जैविक उत्पादों एवं ग्रामीण आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के संबंध में अपने विचार रखे। उन्होंने सुझाव दिया कि गौ-आधारित प्राकृतिक कृषि, सर्कुलर इकोनॉमी और ग्रामीण नवाचार को विद्यालयों एवं महाविद्यालयों की शिक्षा सेजोड़ा जाए, ताकि नई पीढ़ी प्रारंभ से ही इन अवधारणाओं को समझे और अपनाए। उन्होंने कहा कि जागरूक युवा पीढ़ी ही सतत विकास और आत्मनिर्भर भारत की मजबूत नींव तैयार कर सकती है।
संवाद में यह बात प्रमुखता से सामने आई कि भविष्य की गौशाला केवल संरक्षण की जगह नहीं, बल्कि एक ‘ग्रामीण चक्रीय
जैव अर्थव्यवस्था हब’ हो सकती है। जहां गोबर से बायोगैस और स्वच्छ ऊर्जा, जैविक खाद एवं प्राकृतिक कृषि इनपुट,
गोमूत्र से मूल्यवर्धित उत्पाद तथा अन्य गो-आधारित उत्पाद तैयार किए जाएं और एक ही संसाधन से ऊर्जा, कृषि, रोजगार और आय के अनेक अवसर सृजित हो।
इस मॉडल को विकसित भारत @2047 के व्यापक विज़न से जोड़ते हुए स्थानीय संसाधनों के स्थानीय स्तर पर मूल्यवर्धन, अपशिष्ट को संसाधन में बदलने, ग्रामीण युवाओं एवं महिलाओं के लिए उद्यमिता के अवसर पैदा करने तथा गांवों में चक्रीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की आवश्यकता पर भी बल दिया गया।
उत्तर प्रदेश गो सेवा आयोग के मा० अध्यक्ष श्री श्याम बिहारी गुप्त ने कहा कि अब समय है कि गौशालाओं को केवल संरक्षण और अनुदान की दृष्टि से न देखा जाए, बल्कि उन्हें नवाचार, उद्यमिता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के नए केंद्रों के रूप में विकसित किया जाए। हमारा प्रयास है कि प्रदेश की गौशालाओं में हो रहे नवाचारों को देशभर की श्रेष्ठ तकनीकों और सफल मॉडलों से जोड़ा जाए, ताकि गोवंश संरक्षण के साथ रोजगार, आय और आत्मनिर्भरता का एक स्थायी मॉडल तैयार हो सके।
संवाद में उपस्थित उद्यमियों, नवाचारी किसानों, गोसेवी संस्थाओं एवं गौशाला संचालकों ने गौशालाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए नवाचार, तकनीक, मूल्यवर्धन और बाजार से जुड़ाव को आवश्यक बताते हुए ऐसे मॉडलों को प्रदेश की गौशालाओं तक पहुंचाने की आवश्यकता पर सहमति व्यक्त की।
बैठक में यह विश्वास व्यक्त किया गया कि गो-आधारित सर्कुलर बायोइकोनॉमी के माध्यम से ‘गोबर से ऊर्जा, गोमूत्र से मूल्यवर्धन और नवाचार से आय’ का मॉडल विकसित कर गौशालाओं को आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है। इससे गोवंश संरक्षण को ग्रामीण रोजगार, उद्यमिता, प्राकृतिक कृषि और सतत विकास से जोड़ते हुए उत्तर प्रदेश में एक नई ग्रामीण अर्थव्यवस्था के निर्माण का मार्ग प्रशस्त होगा।
