जागरूकता का दीप जलाएँ, फेफड़ों के कैंसर को हराएँ

जागरूकता का दीप जलाएँ, फेफड़ों के कैंसर को हराएँ


संवाददाता।

-धुआँ नहीं, उम्मीद जगाएँ; फेफड़ों को कैंसर से बचाएँ

-साँसों का रखो सम्मान, समय पर जाँच बने जीवन का वरदान-
-प्रोफेसर (डॉ.) वेद प्रकाश

लखनऊ। फेफड़ों के कैंसर से जुड़ी ज़रूरी बातें और आंकड़े:
• फेफड़ों का कैंसर दुनिया भर में दूसरा सबसे ज्यादा होने वाला कैंसर है। वर्ष 2020 में इसके लगभग 22 लाख (2.2 मिलियन) नए मामले सामने आए थे।
• फेफड़ों का कैंसर दुनिया भर में कैंसर से होने वाली मौतों का मुख्य कारण है, जिससे हर साल लगभग 18 लाख (1.8 मिलियन) लोगों की मौत होती है।
• फेफड़ों के कैंसर का मुख्य कारण धूम्रपान है, जो सभी मामलों में से लगभग 85% के लिए ज़िम्मेदार है। अन्य जोखिम कारकों में दूसरों के धूम्रपान के धुएं (सेकंडहैंड स्मोक) के संपर्क में आना, रेडॉन गैस, एस्बेस्टस और पर्यावरण के अन्य ज़हरीले पदार्थ शामिल हैं।
• फेफड़ों के कैंसर में 5 साल तक जीवित रहने की दर इस बात पर निर्भर करती है कि बीमारी का पता किस स्टेज पर चला। शुरुआती स्टेज (लोकलाइज़्ड) वाले फेफड़ों के कैंसर में 5 साल तक जीवित रहने की दर लगभग 59% है, लेकिन शरीर के दूसरे हिस्सों में फैल चुके (मेटास्टैटिक) कैंसर के मामले में यह दर गिरकर लगभग 6% रह जाती है।
• कम-डोज़ वाले CT स्कैन से शुरुआती स्टेज में ही फेफड़ों के कैंसर का पता लगाया जा सकता है, जिससे ज़्यादा जोखिम वाले लोगों में इससे होने वाली मौतों को लगभग 20% तक कम किया जा सकता है।
• फेफड़ों के कैंसर के लगभग 10-15% मामले उन लोगों में होते हैं जो धूम्रपान नहीं करते हैं। इसके कारणों में जेनेटिक कारण, रेडॉन गैस के संपर्क में आना, वायु प्रदूषण और दूसरों के धूम्रपान का धुआं (सेकंडहैंड स्मोक) शामिल हैं।
• पहले पुरुषों में फेफड़ों का कैंसर महिलाओं की तुलना में ज़्यादा होता था, लेकिन अब यह अंतर कम हो रहा है। महिलाओं में फेफड़ों के कैंसर की दर बढ़ रही है, जिसका एक कारण पिछले कुछ दशकों में महिलाओं में धूम्रपान की बढ़ती दर है।
• अकेले अमेरिका में, फेफड़ों के कैंसर का सालाना आर्थिक बोझ 20 बिलियन डॉलर (1.64 ट्रिलियन भारतीय रुपये) से ज़्यादा होने का अनुमान है।
भारत में फेफड़ों का कैंसर: मुख्य आंकड़े और तथ्यः-
• फेफड़ों का कैंसर भारत में सबसे आम कैंसरों में से एक है, और हर साल इसके लगभग 67,000 नए मामलों का पता चलता है।
• भारतीय पुरुषों में कैंसर से होने वाली मौतों का मुख्य कारण फेफड़ों का कैंसर है; कैंसर से होने वाली कुल मौतों में से लगभग 9.3% मौतें इसी वजह से होती हैं।
• भारत में महिलाओं की तुलना में पुरुषों में फेफड़ों का कैंसर (lung cancer) काफी ज़्यादा होता है; फेफड़ों के कैंसर के लगभग 70% मामले पुरुषों में ही पाए जाते हैं।
• भारत में फेफड़ों के कैंसर की दर (age-standardized incidence rate) प्रति 1,00,000 पुरुषों पर लगभग 7.6 और प्रति 1,00,000 महिलाओं पर 2.1 है।
• धूम्रपान एक बड़ा जोखिम कारक है, जो भारत में फेफड़ों के कैंसर के लगभग 85% मामलों के लिए ज़िम्मेदार है।
• अन्य महत्वपूर्ण जोखिम कारकों में खाना पकाने के ईंधन से होने वाला घर के अंदर का वायु प्रदूषण, काम-काज के दौरान हानिकारक चीज़ों के संपर्क में आना (जैसे एस्बेस्टस), और घर के बाहर का वायु प्रदूषण शामिल हैं।
• भारत में फेफड़ों के कैंसर के लिए 5 साल तक जीवित रहने की दर काफी कम है, जो 5-10% के बीच है। इसका मुख्य कारण बीमारी का देर से पता चलना और इलाज के आधुनिक तरीकों तक सीमित पहुँच है।
• ‘नॉन-स्मॉल सेल लंग कैंसर’ (NSCLC) फेफड़ों के कैंसर का सबसे आम प्रकार है, जो लगभग 80-85% मामलों में होता है, जबकि ‘स्मॉल सेल लंग कैंसर’ (SCLC) बाकी 15-20% मामलों में होता है।
• भारत में फेफड़ों के कैंसर के इलाज का खर्च इलाज के प्रकार और अस्पताल के आधार पर अलग-अलग हो सकता है। सर्जरी, कीमोथेरेपी और रेडिएशन थेरेपी सहित पूरी देखभाल के लिए औसत खर्च 1.5 लाख रुपये से 20 लाख रुपये (लगभग 2,000 से 26,000 अमेरिकी डॉलर) के बीच हो सकता है।
‘विश्व फेफड़ों का कैंसर दिवस’ (World Lung Cancer Day) की शुरुआत फेफड़ों के कैंसर के प्रसार और इसके असर की ओर दुनिया का ध्यान खींचने के लिए की गई थी। इस दिन को पहली बार 2012 में ‘फोरम ऑफ़ इंटरनेशनल रेस्पिरेटरी सोसाइटीज़’ (FIRS) और ‘इंटरनेशनल एसोसिएशन फ़ॉर द स्टडी ऑफ़ लंग कैंसर’ (IASLC) के सहयोग से मनाया गया था। तब से, यह हर साल 1 अगस्त को मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण वैश्विक कार्यक्रम बन गया है।

जोखिम के कारक
(Risk Factors)
बीमारी से बचाव और शुरुआती दौर में इसका पता लगाने के लिए जोखिम के कारणों को समझना बहुत ज़रूरी है। फेफड़ों के कैंसर के मुख्य जोखिम कारक निम्नलिखित हैं:
1.धूम्रपान: फेफड़ों के कैंसर का सबसे बड़ा कारण, जो लगभग 85% मामलों के लिए ज़िम्मेदार है। सिगरेट के धुएं में कैंसर पैदा करने वाले तत्व (कार्सिनोजेन्स) होते हैं जो फेफड़ों की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाते हैं और कैंसर का कारण बनते हैं।
2.सेकंडहैंड स्मोक (दूसरों का धुआं): दूसरों के धूम्रपान के धुएं के संपर्क में आने से भी फेफड़ों के कैंसर का खतरा बढ़ जाता है।
3.रेडॉन के संपर्क में आना: रेडॉन, जो प्राकृतिक रूप से पाई जाने वाली एक रेडियोधर्मी गैस है, जो कि फेफड़ों के कैंसर का खतरा बढ़ा सकती है।
4.एस्बेस्टस के संपर्क में आना: एस्बेस्टस के रेशों को सांस के ज़रिए अंदर लेने से, अक्सर काम की जगहों पर, फेफड़ों के कैंसर का खतरा होता है।
5.पारिवारिक इतिहास: आनुवंशिक कारण भी भूमिका निभा सकते हैं; जिन लोगों के परिवार में फेफड़ों के कैंसर का इतिहास रहा है, उनमें इसका खतरा ज़्यादा होता है।
6.वायु प्रदूषण: लंबे समय तक बाहरी वायु प्रदूषण, खासकर बारीक कणों (PM2.5) के संपर्क में रहने से फेफड़ों के कैंसर का खतरा बढ़ सकता है।
7.फेफड़ों की पुरानी बीमारी: क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिज़ीज़ (COPD), टीबी (तपेदिक) और फेफड़ों के पुराने संक्रमण जैसी स्थितियां फेफड़ों के कैंसर का खतरा बढ़ा सकती हैं।
8.काम की जगह पर जोखिम: काम की जगह पर कुछ खास रसायनों और पदार्थों, जैसे आर्सेनिक, क्रोमियम, निकेल और डीज़ल के धुएं के संपर्क में आने से फेफड़ों के कैंसर का खतरा बढ़ सकता है।
फेफड़ों के कैंसर के लक्षण
 लगातार खांसी
 खांसी के साथ खून आना
 सीने में दर्द
 सांस लेने में तकलीफ
 आवाज़ बैठना या भारी होना
 बिना किसी कारण वज़न कम होना
 भूख न लगना
 थकान
 बार-बार इन्फेक्शन होना
 चेहरे या गर्दन में सूजन
 हड्डियों में दर्द
 सिरदर्द
फेफड़ों के कैंसर की जांच:
 मेडिकल हिस्ट्री और फिजिकल जांच
 इमेजिंग टेस्ट:
• चेस्ट एक्स-रे
• CT स्कैन
• PET स्कैन (पॉज़िट्रॉन एमिशन टोमोग्राफी)
• MRI (मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग):
 स्पुटम साइटोलॉजी: कैंसर सेल्स का पता लगाने के लिए माइक्रोस्कोप से फेफड़ों से खांसकर निकाले गए बलगम (स्पुटम) के सैंपल की जांच।
 बायोप्सी प्रक्रियाएं
 ब्रोंकोस्कोपी
 नीडल बायोप्सी
 थोरासेंटेसिस: अगर फेफड़ों के आसपास तरल पदार्थ (प्लूरल एफ्यूजन) है, तो कैंसर सेल्स की जांच के से कैंसर का पता लगाया जा सकता है।
 सर्जिकल बायोप्सी: कुछ मामलों में, टिश्यू का बड़ा सैंपल लेने के लिए थोराकोस्कोपी जैसी अधिक इनवेसिव प्रक्रिया की ज़रूरत हो सकती है।
 लैबोरेटरी टेस्ट:
• मॉलिक्यूलर टेस्टिंग: बायोप्सी से मिले ट्यूमर टिश्यू की जांच खास जेनेटिक म्यूटेशन या बायोमार्कर (जैसे EGFR, ALK, KRAS) के लिए की जा सकती है, जो टारगेटेड थेरेपी और इम्यूनोथेरेपी के फैसलों में मदद कर सकते हैं।
• ब्लड टेस्ट: नए ब्लड टेस्ट, जिन्हें लिक्विड बायोप्सी कहा जाता है, सर्कुलेटिंग ट्यूमर DNA से जेनेटिक म्यूटेशन का पता लगा सकते हैं।
स्टेजिंग: फेफड़ों के कैंसर का पता चलने के बाद, कैंसर की स्टेज तय करने के लिए अतिरिक्त टेस्ट किए जाते हैं, जो फेफड़ों और शरीर के अन्य हिस्सों में इसके फैलने की सीमा बताते हैं। स्टेजिंग इलाज की योजना बनाने के लिए ज़रूरी है और इसमें शामिल हैं:
 मीडियास्टिनोस्कोपी
 एंडोब्रोंकियल अल्ट्रासाउंड (EBUS)
 (PET-CT Scan पेट सी0टी0 स्कैन)
फेफड़ों के कैंसर से बचाव:
 धूम्रपान छोड़ें
 सेकेंडहैंड स्मोक (दूसरों के धुएं) से बचें
 काम से जुड़े खतरों से बचें
 वायु प्रदूषण के संपर्क में आने से बचें: हवा की गुणवत्ता में सुधार करने वाली नीतियों और तरीकों का समर्थन करें, जैसे वाहनों से निकलने वाले धुएं और औद्योगिक प्रदूषकों को कम करना।
 हेल्दी डाइट: फलों और सब्जियों से भरपूर डाइट फेफड़ों के कैंसर के जोखिम को कम करने में मदद कर सकती है। इन खाद्य पदार्थों में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट और अन्य पोषक तत्व फेफड़ों की ओवरऑल हेल्थ को बेहतर बना सकते हैं।
 रेगुलर एक्सरसाइज़
 हाई-रिस्क वाले लोगों की स्क्रीनिंग: लो-डोज़ CT स्कैन से हाई-रिस्क वाले लोगों में फेफड़ों के कैंसर का शुरुआती स्टेज में पता लगाया जा सकता है।
फेफड़ों के कैंसर का इलाज:
फेफड़ों के कैंसर का इलाज कई बातों पर निर्भर करता है, जैसे कैंसर का प्रकार और स्टेज, साथ ही मरीज़ की ओवरऑल हेल्थ।
सर्जरी: अक्सर शुरुआती स्टेज वाले नॉन-स्मॉल सेल लंग कैंसर (NSCLC) के लिए इस्तेमाल की जाती है।
 रेडिएशन थेरेपी: कैंसर सेल्स को टारगेट करके उन्हें खत्म करने के लिए इस्तेमाल की जाती है; अक्सर तब इस्तेमाल होती है जब सर्जरी का विकल्प न हो, या सर्जरी के साथ मिलाकर की जाती है।
 कीमोथेरेपी: कैंसर सेल्स को खत्म करने के लिए दवाओं का इस्तेमाल करती है; अक्सर स्मॉल सेल लंग कैंसर (SCLC) के लिए या कैंसर के फैलने पर इस्तेमाल की जाती है। इसे अन्य इलाजों के साथ मिलाकर भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
 टारगेटेड थेरेपी: कैंसर के बढ़ने में शामिल खास मॉलिक्यूल्स पर फोकस करती है। यह आमतौर पर खास जेनेटिक म्यूटेशन वाले NSCLC के लिए इस्तेमाल की जाती है।
 इम्यूनोथेरेपी: कैंसर से लड़ने के लिए शरीर के इम्यून सिस्टम का इस्तेमाल करती है।
 पैलिएटिव केयर: लक्षणों से राहत दिलाने और जीवन की गुणवत्ता (क्वालिटी ऑफ़ लाइफ़) को बेहतर बनाने पर फोकस करती है; अक्सर अन्य इलाजों के साथ-साथ इस्तेमाल की जाती है।
World Lung Cancer Day का यह दिन संगठनों, हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स, रिसर्चर्स और समर्थकों के लिए एक मंच का काम करता है, ताकि वे जागरूकता बढ़ाने, बीमारी का जल्दी पता लगाने और फेफड़ों के कैंसर से प्रभावित लोगों की मदद करने के लिए मिलकर काम कर सकें। अलग-अलग गतिविधियों और कैंपेन के ज़रिए, ‘वर्ल्ड लंग कैंसर डे’ ने फेफड़ों के कैंसर के खिलाफ लड़ाई में लगातार रिसर्च और इनोवेशन के महत्व को सफलतापूर्वक उजागर किया है।
किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी, लखनऊ (UP) का पल्मोनरी और क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग गर्व के साथ ‘वर्ल्ड लंग कैंसर डे’ मना रहा है। यह प्रतिष्ठित विभाग अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस है, जिसमें ब्रोंकोस्कोपी, थोराकोस्कोपी और EBUS अल्ट्रासाउंड शामिल हैं, जो फेफड़ों के कैंसर का सटीक और समय पर पता लगाना सुनिश्चित करते हैं। इसके अलावा, विभाग सेंट्रल एयरवे ऑब्स्ट्रक्शन (सांस की नली में रुकावट) जैसे जटिल मामलों के इलाज के लिए रिजिड ब्रोंकोस्कोपी और क्रायो-बायोप्सी जैसी एडवांस्ड प्रक्रियाएं भी प्रदान करता है। बेहतरीन देखभाल प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध यह विभाग, नवीनतम गाइडलाइंस के अनुसार फेफड़ों के कैंसर के लिए कीमोथेरेपी, टारगेटेड थेरेपी और इम्यूनोथेरेपी सहित आधुनिक इलाज की सुविधा देता है।
इस प्रेस रिलीज़ में पल्मोनरी और क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग के प्रमुख प्रो. वेद प्रकाश, VPCI के पूर्व निदेशक प्रो. राजेंद्र प्रसाद (Padmashree), प्रोफेसर यू0एस0पाल, विभागाध्यक्ष ओ.एम.एफ.एस विभाग के0जी0एम0यू, प्रो. शैलेंद्र यादव, प्रोफेसर, थोरेसिक सर्जरी विभाग, के0जी0एम0यू, डॉ शिव राजन प्रोफेसर, सर्जिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के0जी0एम0यू, डॉ. सचिन कुमार, डॉ. मो0 आरिफ, डॉ. अनुराग त्रिपाठी, डॉ. ऋचा त्यागी, डॉ.यश जगधारी,डॉ. दीपक शर्मा, डॉ. शुभ्रा श्रीवास्तव, डॉ. संदीप, डॉ. अपर्णा आदि शामिल हुए।

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